Pooja Meri Jaan Review: सहमति और रिश्तों के उलझे सवालों पर आधारित है मृणाल ठाकुर की फिल्म
मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी स्टारर फिल्म 'पूजा मेरी जान' सहमति जैसे गंभीर मुद्दे पर बात करती है, लेकिन अंत में आसान रास्ता चुनती है।
by NEHA RAJPUT
बॉलीवुड में अब ऑन-स्क्रीन सहमति और महिलाओं के फैसलों को गंभीरता से लिया जाने लगा है। इसी कड़ी में मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी स्टारर फिल्म 'पूजा मेरी जान' रिलीज हुई है, जिसका निर्देशन नवजोत गुलाटी ने किया है। फिल्म को समीक्षकों से मिले-जुले रिव्यू मिले हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी पूजा (मृणाल ठाकुर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक थिएटर नाटक में जूलियट का किरदार निभाती है। नाटक के बाद उसका ऑन-स्टेज रोमियो बने अनिकेत (विक्रम सिंह चौहान) उसे प्रपोज करता है। सदमे में आई पूजा शो के बाद उसे मना कर देती है और गुस्से में कह देती है कि वह जाए और मर जाए। इसके बाद अनिकेत आत्महत्या कर लेता है, और पूजा पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लग जाता है। यही से फिल्म की मुख्य कहानी शुरू होती है।
सहमति और रिश्तों के पेचीदा सवाल
फिल्म की शुरुआत काफी दमदार होती है। यह उन पेचीदा मुद्दों को छूती है जहां सहमति बदल सकती है और उसका हर स्तर पर सम्मान होना जरूरी है। एक महिला आज किसी रिश्ते में रहना चाहती है और कल अपना मन बदल सकती है, और इस फैसले को बिना सवाल के स्वीकार किया जाना चाहिए। स्क्रीनप्ले अल्फा मेल मानसिकता और हक जताने की प्रवृत्ति को भी सामने लाता है जो आकर्षण को जुनूनी बना देती है।
अभिनय और कमजोर पक्ष
अभिनय की बात करें तो मृणाल ठाकुर ने पूजा के रूप में बेहतरीन काम किया है। वकील के किरदार में हुमा कुरैशी भी अपनी भूमिका में जंचती हैं। विक्रम सिंह चौहान ने अनिकेत के रूप में एक ऐसे व्यक्ति को निभाया है जो थोड़ा चिढ़ पैदा करता है, जो कि उस किरदार की मांग भी थी। कुल मिलाकर, फिल्म एक अहम मुद्दे पर चर्चा शुरू करने के लिए सराहना की हकदार है, लेकिन यह अफसोस की बात है कि यह उस जटिलता को बनाए रखने के बजाय अंत में एक आसान और सुविधाजनक समाधान चुन लेती है।
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