बॉलीवुड में इन दिनों फ्रेंचाइजी और सिनेमैटिक यूनिवर्स का जबरदस्त क्रेज देखने को मिलता है। हर सफल फिल्म के बाद उसका अगला पार्ट बनाने की होड़ सी लग जाती है। ऐसे समय में दृश्यम द कन्क्लूजन ने यह साबित कर दिया है कि किसी सफल कहानी को कब और कहां रोकना है, यह बात उतनी ही जरूरी है जितनी कि उसकी शुरुआत करना।
विजय सलगांवकर की कहानी का अंत
अजय देवगन स्टारर इस सस्पेंस थ्रिलर ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन करते हुए दुनिया भर में पांच सौ करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया है। जहां एक तरफ बड़े-बड़े स्टार्स की फिल्में बजट निकालने में संघर्ष कर रही हैं, वहीं दृश्यम ने यह दिखा दिया कि एक बेहतरीन कहानी और दमदार अभिनय आज भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच सकता है। पारंपरिक बॉलीवुड फॉर्मूला यही कहता है कि इतनी बड़ी सफलता के बाद तुरंत दृश्यम 4 का ऐलान कर देना चाहिए।
क्यों जरूरी है रुक जाना?
निर्देशक अभिषेक पाठक ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि विजय सलगांवकर की यात्रा अब अपनी मंजिल तक पहुंच चुकी है और इसके आगे का कोई भाग नहीं बनाया जाएगा। यह फैसला वास्तव में सराहनीय है। हर सफल फिल्म को तब तक खींचना सही नहीं है जब तक कि दर्शकों का उत्साह ही खत्म न हो जाए। यदि दृश्यम 4 बनाई जाती है, तो बार-बार वही बिल्ली और चूहे वाला खेल दोहराने का जोखिम बढ़ जाता है।
दर्शकों के दिल में बनी रहेगी छाप
दृश्यम की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता और विजय सलगांवकर का सामान्य परिवारिक व्यक्ति होना है। यदि इस किरदार को बार-बार असंभव परिस्थितियों से बाहर निकलते दिखाया गया, तो फिल्म अपनी मूल विश्वसनीयता खो सकती है। मेकर्स का यह फैसला इस बात का उदाहरण है कि हर सफल प्रॉपर्टी को तब तक भुनाना जरूरी नहीं है जब तक कि उसकी जान ही न निकल जाए।
