भारत में ओटीटी और स्ट्रीमिंग का दायरा पिछले दस सालों में काफी तेजी से बढ़ा है। आज के समय में बड़ी फिल्में और जाने-माने सितारे सीधे नेटफ्लिक्स जैसे इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म्स पर आ रहे हैं। इस बदलाव ने न सिर्फ दर्शकों के देखने के तरीके को बदला है, बल्कि फिल्ममेकर्स के सोचने का तरीका भी पूरी तरह बदल दिया है।
रिव्यूज अब फिल्म की सफलता तय नहीं करते
नेटफ्लिक्स इंडिया की ओरिजिनल फिल्म्स की डायरेक्टर रुचिका कपूर शेख ने एक इंटरव्यू में बताया कि पहले के समय में रिव्यूज किसी भी फिल्म के लिए मेक-ऑर-ब्रेक साबित होते थे। खराब रिव्यूज से फिल्में पहले वीकेंड में ही डूब जाती थीं, जबकि अच्छे रिव्यूज संघर्ष कर रही फिल्मों को भी ऊपर उठा देते थे। लेकिन अब स्ट्रीमिंग फिल्मों को बॉक्स ऑफिस की तरह रिव्यूज पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता।
रुचिका ने स्पष्ट किया कि हालांकि रिव्यूज बातचीत का एक अहम हिस्सा जरूर हैं, लेकिन वे किसी फिल्म की संभावित सफलता का पैमाना नहीं हैं। उन्होंने कहा कि आज का एंटरटेनमेंट लैंडस्केप इतना लोकतांत्रिक हो गया है कि हर फिल्म अपने दम पर आती है और दर्शक व्यक्तिगत रूप से अपनी पसंद के अनुसार फिल्म तक पहुंचते हैं।
चर्चा में रहने वाली फिल्में
नेटफ्लिक्स की इस अधिकारी का कहना है कि आज वे फिल्में ज्यादा रिकमेंड होती हैं जिन पर चर्चा होती है, भले ही उनके सबसे अच्छे रिव्यूज न आए हों। अमर सिंह चमकीला जैसी फिल्मों को हर कोई रिकमेंड करता है, जबकि 'हसीन दिलरुबा' या 'सिकंदर का मुक़द्दर' जैसी फिल्मों को भले ही हर कोई न सुझाए, लेकिन उन्हें बड़े पैमाने पर देखा जाता है।
मनोरंजन और विचार में नहीं करना पड़ता चुनाव
स्ट्रीमिंग ने फिल्ममेकर्स का नजरिया भी बदला है। पहले कई मेकर्स और कलाकार केवल इसलिए बड़े बजट की मसाला फिल्में बनाते थे ताकि वे अपनी पसंद की छोटी और लीक से हटकर फिल्में बना सकें। रुचिका का मानना है कि अब स्ट्रीमिंग पर ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। अब मेकर्स को मनोरंजन और विचारोत्तेजक फिल्म के बीच कोई एक नहीं चुनना पड़ता, क्योंकि ओटीटी पर हर कंटेंट के लिए एक तय दर्शक वर्ग मौजूद होता है।
